इन्द्रियों से दूरी कुछ में,
पूर्ण निर्वृत्त ना होती उनमें ,
आसक्ति जीवत रहती ,
प्रवृत्ति नहीं बदलती उनमें ,
2/181
स्थितप्रज्ञ पुरुष को देखो ,
परम तत्व में आसक्ति है ,
परमपिता से होगा मिलन ,
निर्वृत्त करती आसक्ति है ,
2/182
बलात पुरूष के मन को ,
आसक्ति में बढ़ते देखा ,
बुद्धिमान भी हारे इनसे ,
शिखर पे चढ़ते गिरते देखा ,
2/183
समाहितचित्त में साधक,
इन्द्रियां बस में कर लेता, है
ध्यान ज्ञान केन्द्रित उसमें
बुद्धि स्थिर कर लेता है
2/184
आसक्ति, विषय ,विषयान्तर,
कामना पैदा करता चिन्तन ,
विध्न करे बर्दाश्त से बाहर ,
क्रोध तोड़ता तन मन
2/185
मूढ़ भाव देता है क्रोध ,
भ्रमित होती बुद्धि हमारी ,
ज्ञान शक्ति ,निर्णय क्षरण
क्रोध मिटाता शक्ति हमारी
2/186
बुद्धि नाश् मानव पतन ,
पशु समान बन जाता है ,
राग द्वेष आसक्ति में लीन,
गर्त में व्यक्ति गिर जाता है ,
2/187
आधीन रखा जिसने इनको ,
राग द्वेष से प्रभाव नहीं ,
अन्तःकरण है साफ स्वच्छ ,
उनका कोईं जबाव नहीं
2/188
खिलता रहता अन्तःकरण,
फर्क नहीं दुख या विपदा,
ईश भक्ति में गहन लीन,
स्थिर रहता सदा सर्वदा
2/189
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

No comments:
Post a Comment