चतुर्थ अध्याय
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
कर्म-विभाजन
फल की इच्छा,
सेवा करनी सबको मेरी
कर्म का कर्ता मैं हूं जानो
कर्म
में भला कौन सी देरी
4/491
जगत
की रचना मेरी
लहू का रंग ए्क समान
कर्म
में कैसा भेदभाव?
जो
बाटें समझो मूर्ख समान
4/492
Note----Some
people are confused here ,
even
Shakespeare has written ,
some
people are born great,
some
achieve greatness and
upon
some greatness is entrusted
upon. Work is pious ,
it
is not ours ,but already exist here.
कर्म
का कारक मैं हूं
सृष्टि रचना कर्ता मैं
रहस्य व्याप्त है जग में
अकर्ता रहता फिर भी मैं
4/493
Note-----Many
poets and writers
have
talked of Secrets/mysteries
prevailing
here. Einstein
also claims that the Nature
shows
its tail only and we
claim
to study scientifically,
major
portion is beyond our reach
कर्म
से फल ,कर्म का फल ,
लगाब
रहे मुझसे दूर ,
तत्व
ज्ञान से मुझकों जाने,
वह प्रिय ना रहता मुझसे दूर”
4/494
असमंजमस
में अर्जुन है,
प्रभु की
बातें रहस्य भरी,
जगत का कर्ता ,हे भगवन !
ज्ञान
राह है प्यास भरी
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अकर्ता
से पैदा भ्रम,
शान्त
रहे सृजन के बाद ,
कर्म
से, कर्म में मानव स्वतन्त्र ,
पर
अंशात चित्त कर् ते फरियाद
4/496
माया
मोह के ज़ाल को तोड़,
वीर
महान सपूत आगे आते ,
राजधर्म
निभा सच्चे मन से ,
देश
समाज की रक्षा करते
1/496
जब
सब सोते रहेगें ,
देश
धर्म सब खोते रहेंगे,
धर्म
की हानि होगी तब
फिर
क्या बैठे रोते रहेंगे
4/497
शान्त
प्रेम की बातों को ,
अधर्म
नहीं मानता है,
इसको
इसकी हद में रखना ,
अधर्म
यही जानता है
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छूट इसे(अधर्म) मिल जायेगी, अर्जुन,
होगी मार काट ,लूटपाट, हाहाकार
विनाश करेगा
आलिंगन ,
बोलो किसकी होगी जय जयकार
4@499
ज्ञानवान थे पूर्वज अपने
जो हमको
दिये है सब
कर्म महान उनका था
राह निकाली उननें तब
4@500
मिला है हमको उनसे
पावन पवित्र उपवन अपना
कर्म महान धरा की जान
कहते करते पूरा सपना
4@501
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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