चतुर्थ अध्याय
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
कर्म क्या ?अकर्म क्या ?
गूढविषय रहें है सब
अधर्म स्वरूप बिगाड़े इनका
भ्रम भी मिलता अब तब
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“हे! पार्थ भ्रम न पालों!
इनको समझो
पहले बेहतर
बन्धन मुक्त तुम हो जाओगे
मर्म करेगा तुमको तर
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मोहित करते कर्म यहाँ ,
गति की समझ गहन बड़ी,
कर्म अकर्म विकर्म की गुत्थी,
छानबीन है सघन बड़ी
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जानो इनके रूप स्वरूप,
समझो इनका तत्व ज्ञान
दूर न भागो अर्जुन तुम,
तभी बनोगे ज्ञानवान
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जो समझे कर्म में अकर्म
अकर्म में कर्म नजर आये,
विकर्म की गति को समझे
वही ज्ञानवान कहलाये
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पडित वही होता है, अर्जुन
बिना कामना कर्म करे ]
ज्ञान से ना भ्रम आये,
शास्त्र सम्मत जो कर्म करे
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कर्म त्याग देता वो ,
तत्व मर्म का जाना जिसने
,
परम तत्व से तृप्त हर दिन
जो,
समझ लिया संसार को उसने
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भोगों को त्यागा जिसने,
इन्द्रियां कीं बस में जिस ने,
पाप पुन्य से दूर है रहता
कर्म मर्म को जाना उसने
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सन्तोष मिलेगा उसको ,
जो भी मिलता राह में उसके
हर्ष शोक द्वन्दों से ऊपर,
ईष्या द्वेष साथ रहे ना उसके,
4/510
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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