चतुर्थ अध्याय
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
सिद्धि असिद्धि का फर्क
नहीं
फल के पीछे दौड़ नहीं,
बन्धन बांध सके न उसको ,
कभी करेगा होड़ नहीं,
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धर्म वही जो दिल को जीते
,
द्वेष भाव की बात चले ना,
विश्व हमारा उपवन है ,
अधर्म ना समझे इसको हाँ
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पशु पक्षी या इंशा हों ,
प्रेम से दिल है सबका धड़कता,
अधर्म भला क्या समझेगा ?
काटो, पीटो,मारो कहता फिरता
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अधर्म ढ़ोग रचाता ,पार्थ
,
सत्य की बालि का देता उदाहरण
,
पलभर में भ्रमित करता
देता उदाहरण साधारण
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जीव जन्तु परम तत्व की देन
समय ने सबको बन्धन में डाला
सारा जीवन एक समान
भेद भाव मूर्खों ने डाला
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यज्ञ में अर्पण करना,
यज्ञ में बृह्मतुल्य है
माना ,
हवन द्वव्य बृह्म रूप है,
कर्ता बृह्मस्वरूप है माना,
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बृह्मस्वरूप
है आहुति देना ,
यज्ञ करा ना कर्म पुन्य
है,
फल की प्राप्ति
बृह्मस्वरूप ,
आगे इसके सिर्फ शून्य है,
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देवपूजन भी होता है ,
यज्ञ सरीखे अनुष्ठान,
दर्शन अभेद यज्ञ के द्वारा
करते है योगी महान,
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यज्ञ की माया अपरम्पार ,
जानी स्वाह करे वासना ,
विषय विषयान्तर की लत ,
तर्पण पाती सभी कामना
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यज्ञ का मार्ग सरल है,
दर्शाता त्याग
तपस्या ,
बृह्म हवाले करो स्वयं,
हटती है सभी समस्या
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मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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