Friday, 17 November 2017

02-----आज का पाठ

अप् नौ को देखा खून पिपासु,

अर्जुन का मन् डोल गया I

नही चाहिए राज सिङ्गाशन ,

दिल भी  उस् का बोल गया

II8II

 

घबराकर, सिर पीटे, रोकर

अर्जुन होता गया अधीर I

उपाय ना सुझा उस् को कोई,

तर्कश मे रख दिये तीर

II9II

 

अप् नौ की लाशो पे राज महल,

नही चाहिए, अर्जुन बोला I

डर के मारे कॉंप उठा,

दिल बैठा, मन उस्  का डोला।

II10II

 

अर्न्तमन का अर्न्तद्वन्द्ध ,

करना कुछ है पुन्य

अपने मुझको जान से प्यारे ,

परन्तु( उसको) चेतना करती शून्य

I11I


 

माधव ने अर्जुन को देखा,

मुस्काते मुस्काते -सुना सभी I

अर्जुन होगें इस हाल में,

देखे माधव नहीं कभी

 I12I

 

(बार- बार )प्रश्नों की बौछार की बारिश

घबराये अर्जुन करते I

क्यों, क्या, किसको, कैसे ,

कहते हुये कभी न थकते

I13I

 

माधव ने दी खुली छूट,

अर्जुन तुम निशंक कहो

शेष बचे न प्रश्न कोई,

मन करता जब तक कहो I14I


मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना राज)

शेष कल

 

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