Saturday, 18 November 2017

03----आज का गीता पाठ-3

आज का गीता पाठ-3
अर्जुन भोलाभाला इंशा,
जान ना पाता जीवन मर्म
दूर परिधि से सोच समझ के 
करता रहता अपना कर्म
15

है मनुष्य की कमजोरी क्या
धन वैभव उसका मकसद
दिन रात लगा रहता है वो
नहीं समझता अपनी हद II16II

ये मेरा है ये तेरा है !
जीवन कहता यही कहानी ,
इक हवा का झोका है ये,
जाती है नींद सुहानी II17II

आपाधापी,मारकाट, अर्जुन !
नियम बनाता अपनी खातिर,
सत्य मिटाना उसकी फितरत ,
बन जाता है स्वयं ही शातिर II18II
(Unable to bear with truth 
and hence goes astray)

दुनिया के इस रंगमच को,
निर्देशन देता भगवान I
जब तक ऊपर वाला चाहे
रोल निभाता है इंशान
(19)

सहने की ताकत!
नियम शाश्वत चलता है I
झूठ कभी ना पनप सका,
सत्य सदा संग चलता है I20I

माया मोह की गजब दास्तां ,
इस भ्रम में है दुनिया सारी ,
मेरा है ,ये मेरा है बस !,
मची इसी की मारामारी I21I
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना राज)
शेष कल

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