“दुख तेरा जायज है ,राजन!
विकल्प समझ ना आता है
युद्ध भला ना करता है
दुख मुझको भी सताता है
42
जिन हाथों से अपने खेले
जिन हाथों ने इन्हें बनाया
क्या होगा राजन ! अब तो ?
इतना किसने हमें सताया
43
शिक्षा दीक्षा उत्तम दी है
लोभ लालच यह किसका है
हाल बुरा इतना होगा
दोष यहां पर किसका है
44
युद्ध कभी ना अच्छा है
मानवता का नुक्सान किया है
छितरे बिखरे अंगों को देखा
इस ने केवल दुख दिया है
45
पांडु पुत्र हारे या दुर्योधन जीते
नुकसान भला क्या सह पाओगे
दोष ढूंढती जनता है
छिपा ना गलती तुम पाओगे
“
46
“बात तुम्हारी सच है, संजय !
बेबस मैं लाचार हूं !
आगे का वृत्तांत सुनाओ ,तुम
बस सुनने को मैं आतुर हूं”
अध्याय बोध
समाप्त
जय हो कृष्णा
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,
प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,
गिर ने कभी ना तू देता--1
गिर ने कभी ना तू देता--1
साथ मेरे जो पाठ है करते
,कृपा बरसते रखना तू
,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,
बस ध्यान में रखना कृष्ना तू--2
बस ध्यान में रखना कृष्ना तू--2
निपट निरक्षर अज्ञानी है
हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा,
शरणागत बस अपनी लेना II-3
शरणागत बस अपनी लेना II-3
(अर्चना व राज)
शेष कल

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