द्वितीय अध्याय--समर्पित है--मीठी -२ यादो के लिये----
माँताजी , भाई डा० राजीव कुमार सिंह,,मित्र-एस० के ० सिह्
and all those known or unknown ,Who left for heaven
with sweet memories left behind, May Lord Krishna let their soul rest in peace
with heavenly bliss!)
“कौन हो तुम ! पार्थ,
क्या कभी स्वयं को समझा,
जीवन मिला है जीने को,
क्या यही अभी तक बूझा
2/48
कर्त्ता नहीं हो जगत के तुम !,
जो चाहो कर सकते,
निमित्त मात्र उस कर्त्ता के,
वो चाहे तब तक हम जीते
2/49
सत्य मार्ग है दुर्गम भारी ,
सत्य विश्व का है आधार ,
सत्य मार्ग पे चलना तुमको ,
यही है जीवन का सार
2/50
लोग करोड़ों मरते प्रतिदिन,
जन्म पुनः वे पाते हैं
हजार साल का इन्तजार,
योद्धा तुम जैसे आते हैं
2/51
धर्म अधर्म का महायुद्ध ,
जीत धर्म की होनी है,
धर्म की रक्षा तुमको करनी ,
लिखा यही, अब होनी है
2/52
Who are you,Parth,
Did you know thyself,
Life is to live,
Understood thyself.
You are not the doer of the World,
As wished and did,
Only a sign of that Doer,
This is the Truth candid
The path to Truth is difficult,
But Truth is basis of the world,
To follow this path,
Is the essence of life in the world,
Thousand die everyday,
And reborn are they,
Wait of thousand years,
Warrior like you find the way
‘’जब-2 अत्याचार बढ़े,
अधर्म ने जगह बनाई अपनी ,
दाता भेजा योद्धा तुम जैसे ,
मिटा अधर्म जगह बना अपनी
2/53
माया मोह के इस जगत में,
न तेरा कोई, न तुझ से बनता है,
क्षण भंगुर जीवन में तू,
क्यों इठलाता फिरता है
2/53
आज जो तेरे हैं !
भ्रम तूने पाल रखा,
कल को दूर-2 तक,
ना बनेगा तेरा कोई सखा
2/54
वे भी चाहें तब भी,
कुछ कर नहीं सकते ,
सदा को इस दुनिया
में,
वे भी जुड़ नहीं सकटे
2/55
यही रहस्य इस दुनिया में,
समझ से बाहर रहता है ,
तुझको यही समझना होगा,
जो दाता तुझसे कहता है
2/56
कर्म किया किया है जिसने जैसा,
फल उसका निर्धारित है,
कल का कर्म आज का भाग्य,
नियम यही संचालित है
2/57
(बीता हुआ- कल -- कृपया ध्यान दें कर्म के बाद भाग्य है)
जब-2 धर्म की
होगी हानि,
अधर्म बढ़ाता अत्याचार ,
तय सीमा से आगे, अर्जुन
न बढ़ पायेगा अत्याचार
2/58
इसे थामने की ताकत ,
तुम जैसे योद्धा करते हैं ,
तेरी ताकत के आगे , अर्जुन
नतमस्तक सब होते हैं
“””’’
2/59
आत्मा ,अजर ,अमर
न कभी ये मरती है,
इसका काम खत्म होता,
नवजीवन धारण करती है
2/60
कर्म करो ,बस कर्म करो,
फल की इच्छा कभी न करना,
जैसा तेरा कर्म होगा , अर्जुन
अनुरूप उसी के सबकुछ मिलना
2/61
पाक साफ दिल से रहना ,
धर्म की खातिर आगे बढ़ना,
मिटेगा अधर्म ; होगा अर्जुन
प्रकाश पुञ्ज से जगत का खिलना
2/62
कर्म का मिला अधिकार ,(तुझे ) ,
कर्म स्वयं ही करना है,
जैसे तेरे कर्म होगें , अर्जुन
अनुरूप उन्ही के भरना है,
2/63
देखो भीष्म पितामह को,
वचनबद्धता बनी कमजोरी ,
सिद्धान्त प्रिय हैं व्यक्ति महान,
चली ना इन की सीनाजोरी
2/64
द्रुयोंधन जैसा योद्धा बलशाली ,
शातिर दिमाग उसका चलता ,
कटु वचन उनसे कहता ,
नहीं किसी की चलने देता
I2/65
अर्जुन सबसे प्रिय हो तुम ,
असहाय हैरान हैं पितामह ,
नहीं चाहते युद्ध वे बिल्कुल,
ये होता बोलो किसकी शह
2/66
शिक्षा जिनसे तुमने पाई ,
प्यार से तुम्हें सिखलाया ,
आज उन्हीं हाथों में देखो,
विरुद्ध तुम्हारे तरकश आयाI
2/67
भाई ! हां भाई है सारे तेरे अर्जुन ,
खून के प्यासे तेरे हैं ,
नहीं युद्ध धरा पे हो ,
ये न बस में तेरे है.
2/68
परिस्थिति बनी प्रतिकूल ]
सारे योद्धा फेल हुए ]
जो होना है वो होता है
इनमें कभी ना मेल हुए
2/69
वही खून, इक परिवार पुराना,
दुनिया जिनसे भय खाती ,
खून बना खून का दुश्मन,
किस्मत इसको सामने लाती
2/70
परिस्थिति बनी प्रतिकूल,
सारे योद्धा ! फ़ेल हुये ,
जो होना हैं वो होता है,
इनमें कभी ना मेल हुये
2/71
सत्य झूठ दो भाई बन के,
मैदान युद्ध के आ डटे ,
इतना ताकतवर ना कोई ,
बिना लड़े ये हटे
2/72
यह भी सच है ,अर्जुन !,
जीत सत्य की तय है ,
अधर्म कभी ना सिर बोला ,
अल्पकाल इस का भय है
2/73
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)

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