पापी को हद में रखना,
अर्जुन !कन्धौ पे तेरे भार है,
अधर्म मिटा सका ना तू ,
जीना तेरा धिक्कार हैं
I2/102
ना कोई तेरा इस जहां में ,
अल्प समय का फेरा है,
अपना कार्य पूर्ण करो तुम ,
ये फेरी वाला डेरा है I
2/102
किस कारन ये मोह हुआ ,
समझ से मेरी बाहर है ,
रण क्षेत्र में इसी समय,
श्रेस्थ व्यवहार से बाहर है
I2/103
समय का समय पे ध्यान ,
बखां महापुरुष करते है,
धर्म की रक्षा हेतु ,
योद्धा युध क्षेत्र में जाते है
I2/104
इसी तरह से सोते रहोगे ,
देश धर्म सब खोते रहोगे ,
डर है तेरी कायरता ,
पार्थ I कब इसको समझोगे
I2/105
त्याग हृदय की दुर्बलता ,
गांडीव उठा ! तू आगे बढ़,
ना मर्दो का व्यवहार ना हो ,
चल !युध क्षेत्र में आगे बढ़ “”’’
I2/106
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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