“हे माधव ! मन में संताप,
हद से बाहर जाता है,
गुरुदेव ,तात श्री ,पूजनीय,
अटूट मेरा नाता है
I2/107
भीख माँगना है मंजूर,
खून हाथ से नहीं सने ,
अपनौ को मौत सुलाकर,
क्यों भोग विलाषी हम बने
I2/108
आने वाला पल कैसा होगा ?,
मुझको ये तो ज्ञात नहीं ,
वे जीतेंगे, हम जीतेंगे,
सुब कुछ है अज्ञात यहीं
I2/109
माधव ! मैं हूँ
शिष्य आपका,
ज्ञान की भिक्षा दिल से चाहता,
कलयाणकारी जो भी होगा,
मन से उसको करना चाहता
I2/110
हरा भरा हो राज्य मेरा,
धनधान्य भरे भण्डार रहें,
देवो जैसा शासन हो,
अविरल सुख की धारा बहे
I2/111
मन की शांति कोसों दूर,
भला क्या मैं
लड पायूँगा,
नहीं चाहिए मुझको कुछ,
अपनौ को सब दे जायूँगा ”
I2/112
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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