“अर्जुन इतना ना भोला बन ,
सीख जरा विद्वानों से ,
जो चले गये या जाने को हैं ,
शोक दूर रहे विद्वानों से
I2/113
सत्य यही है ,अर्जुन
सदा रहा आसितत्व मेरा,
समय बदलता युग बीते ,
बदल सका ना आसितत्व मेरा
I2/114
मोह शरीर का कभी ना करना,
शरीर बदलते रूप बदलते ,
आत्मा ,अजर ,अमर ,मौजूद सदा ,
जीवन मिलता जब हम मरते
I I2/115
तू क्या जाने ,तू क्या समझे ,
कितने जीवन तूने जिए ,
राजा हो रंक यहां ,
जीवन भोगे जन्म लिए
I2/116
बालपन के सुनहरे पल ,
नींद सुहानी लाये जवानी,
वृद्धावस्था पार किऐ,
मौत लिखती नई कहानी
I2/117
सुख दुख इस जहां में ,
विषय संयोग भी रहते हैं ,
सृष्टि से जुड़े विषय विषयानतर,
सहन सभी हम करते हैं
I2/118
मोक्ष योग्य वे पुरुष यहां,
समान झ्हें वे जानते ,
परछाई से व्याकुलता न ,
मन से इनको मानते
I2/119
अर्जुन !व्याकुल तेरा मन,
व्यथित रही तेरी मानवता ,
सबकुछ अपना दिखता है ,
नहीं किसी से दिल में कटुता
I2/120
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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