ज्ञानी समझे इस का मर्म ,
अज्ञानी वने हंसी का पात्र ,
आश्चर्य भरा है तत्वों में ,
क्या अर्थ निकालें मात्र?
2/137
अवध्य ,आत्मा ,सर्वव्यापी ,
सनातन है प्रवित्त इसकी ,
भय से क्या लेना देना ,
अदभुत ,गजब प्रकृति इस कीI
2/138
अर्जुन, क्षत्रिय हो तुम!,
भाग युद्ध से न जाओ',
धिक्कारेगी दुनिया सारी ,
माँ का दूध नहीं लजाओं.I
2/139
भाग्यवान बने हो तु म,
सौभाग्य मिला है तुमको ,
भय से कहाँ जाते हो तु मI
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कीर्ति साथ नहीं देगी ,
स्वर्ग का द्वार दूर रहेगा ,
अपकीर्ति सदा तुम्हें मिलेगी
2/141
शर्मनाक है बात यहाँ ,
इससे बेहतर मर जाना,
अप कथन कहेगा सारा जहाँ I
2/142
लघुता तेरा हरण करेगी ,
भय के कारन अर्जुन !,
अपकीर्ति तेरा वरण करेगी I
2/143
अपयश शब्द नहीं रूकेगें ,
इससे बड़ा दुःख क्या ?,
लोगों की नजर में हम गिरेगें I
2/144
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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