मृत्यु वरण कर लेगी,
स्वर्ग में तेरा स्वागत है ,
जीत मिली संग्राम में ,
धरा पे लेा ! तेरा स्वागत है
I I2/145
लाभ ,हानि ,जीवन ,मरण ,
यश, अपयश समान समझ ,
सुख- दुख ,जय -पराजय ,
असमान नहीं ,इन्हें समझ
I I2/146
कृष्ण ने कहा अर्जुन से !,
त्यागो भय ,देर ना कर,
महान योद्धा इस धरा का तू ,
तैयार रहो ,युद्ध कर
I I2/147
“आज का कर्म ;भाग्य है कल “
ज्ञान मिला है तुमको ,
जा कर्म में परिवर्तित कर,
त्याग सभी बन्धन अब,
तैयार रहो ; युद्ध कर
I I2/148
बुद्धि हीन है पुरुष वे,
मीठी वाणी से कहते ,
वे क्या रक्षा कर पायगे? ,
भोग विलास में डूबे रहते
I I2/149
अहंकार का प्रर्दशन ,
ऐश्वर्य ,कामना ,कमजोरी ,
बुद्धिहीन ,वे कर्महीन ,
जीवन जैसे किताब है कोरी
I I2/150
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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