अप्राप्ति का प्राप्ति योग ,
प्राप्ति की रक्षा क्षेम कहें
,आसक्ति-हीन ,द्वन्दरहित ,
वेदों की वाणी यही कहें
I I2/151
योग बने साध्य तेरा ,
साधन इसके क्षमा योग्य!
कर्तव्य निभा ,प्रभुता पा ,
उत्तम ,सर्वोत्तम ,योग धारण-योग्य!
I I2/152
वर्षा होती, जल भरता! ,
पोखर जा सागर से मिले,
बनता ज्ञान का सागर विशाल ,
अथाह ज्ञान की लहर चले
I I2/153
तेरा नाता कर्म से है,
फल का मिलना भी तय् हैं,
जैसा तेरा कर्म रहेगा ,
अनुरूप उसी के मिलना (भी) तय् हैं:
I I2/154
फ़ल्
की इच्छा नहीं करो,
फ़ल् की पहुँच हाथ से दूर,
आज का
कर्म
भाग्य
है
कल
,
मिलता सदा, ना जाता दूर
I I2/155
कर्म करें, सोचे जीत ,
जीत हार का वियोग यहाँ ,
हार सोचते ,जीत मिले,
हार का हार संयोग यहाँ
I I I2/156
अर्जुन, उठों धनुष को तान ,
धर्मयुद्ध का रख तू मान ,
अधर्म का अंश मिटेगा,
हिम्मत कर ,तू इसको जान
I I2/157
कंरु ना कंरू के फेरे में ,
उलझ ना ,तू गिर जायेगा ,
निर्णय तेरा मुशिकल होगा,
अधर्म धरा पे रह जायेगा
I I2/158
सोचो ! देखो! युद्ध यहाँ,
मान सम्मान जिन्होंने पाया,
कुछ तो अधर्म से जा मिले,
अंधेरा तन मन पे छाया
I I2/159
सम बुद्धि युक्त पुरूष बनो ,
पाप पुन्य को अब, त्यागो ,अर्जुन !,
समत्व स्वरूप है कर्मकुशलता,
कर्म बन्धन से जागो ,अर्जुन !
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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