समबुद्धि वाले पुरूष यहां,
बड़े वे ही ज्ञानी है ,
फ्लेच्छा -विहीन हैं. वे ,
पर हम सब अज्ञानी हैं
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जिस दिन दलदल मोह रूप ,
अर्जुन !तुमने पार किया ,
लोक परलोक के भोगों से ,
समझो ,अपना उद्धार किया
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वैराग्य मिलेगा, तुम को अर्जुन !,
निर्विकार परम पद को पाओगे ,
जीवन का मर्म मुठ्ठी में !,
तारण स्वयं को कर जाओगे
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योद्धा का सम्मान दिलों में ,
जो अर्जुन तूने पाया ,
लोग सुनेंगे कायरता,
झूठ कहेंगे की माया I
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नहीं चूकते रहें विरोधी,
मौके की ताक में सदा रहेगें,
निन्दा करते नहीं थकेगें,
कटु वचन सदा कहेंगे I
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समत्व रहो कर्मों में तुम ,
सिद्धि असिद्धि एक समान ,
आसक्ति को त्यागो ,अर्जुन !,
यहीं छिपा तेरा सम्मानI
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बुद्धि योग का आश्रय लो ,
फल को मुझपे छोड़ो ,
कर्म समझ ,कर्तव्य निभा ,
मोह से तुम नाता तोड़ो I
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कुछ तो अज्ञानी यहां ,
असत का राज बढ़ाते हैं ,
आढ़ में लेते सत तत्व ,
लोगों को मूर्ख बनाते हैंI
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सबके अपने-2 कर्म,
सबकी अपनी बानी है ,
फ्लेच्छा में जीवित,
यही बात अज्ञानी है I
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मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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