Sunday, 24 December 2017

आज का गीता पाठ-22

आगे इसके सुनो ,अर्जुन !,

तरह तरह नियम अपवाद सुने,

बुद्धि को भ्रमित करते ,

कुछ स्वयं को तारनहार बने 

I I2/170

सुन-2 के विचलित बुद्धि ,

कब तक ऐसा सहते रहोगे?,

अचल व स्थिर होगी जब ,

परमतत्व को प्राप्त करोगे I

I I2/171
                        बुद्धि योग माध्यम तेरा,
 सत सदा करो सहन,
 संयोग तेरा सम्भव है!
 ईश्वर से जब होगा मिलन
I I2/172
 भ्रमित हुये अर्जुन ,थोड़ा,
 स्थिर बुद्धि समझ से परे ,
कैसे क्या लक्षण हैं !,
समझाओ इनको ,माधव मेरे,
I I2/173
                      जिज्ञासा मन में  देखी जब,
 अर्जुन पाला उत्तर की चाहत ,
माधव ने शुरू किया बताना ,
देखे अर्जुन पाते राहत ,
I I2/174
 मन हैं चंचल,मन हैं कोमल,
 फलेच्छा में जीता है ,
सन्तुष्टि  मिली,फलेच्छा गायब,
 स्थितप्रज्ञ वो हो जाता है,
I I2/175
फल से फर्क पडे ना  उसको,
जब जीवन में मिलता है ,
आत्मा इंशा काया में ,
सन्तुष्ट सदा वो रहता है
I I2/176
                      स्थिर बुद्धि उस मानव में ,
मन में उद्वेग नहीं दुख में,
 राग ,भय, क्रोध, रफूचक्कर ,
सर्वदा निस्पृह रहता सुख में ,
I I2/177
अनन्त कामना लेके जीता ,
स्नेह रहित मुशिकल से होता ,
फितरत जीवन की ऐसी है ,
पाने को हरदम रोता
1 I I2/178
                         स्थिर बुद्धि होती उसकी
शुभ अशुभ में फर्क पडे  नहीं
विषयों से वो दूर रहे,
 आगे इसके तर्क नहीं ,
I I2/179
समेटे अपने अंग -2,
सीख उसे कच्छप देता,
 इन्द्रियाँ रहे विषयों से दूर,
 वो वश में कर लेता ,
I I2/180
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससेक्या लेनाक्या देना I
कृपा बनाये रखनाकृष्णाशरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना  राज)



शेष कल

No comments:

Post a Comment

गीता जीवन पथ: 117----- आज का गीता जीवन पथ

गीता जीवन पथ: 117----- आज का गीता जीवन पथ : 18वां अध्याय  *Chapter 18* _Let Go, Lets move to union with God_ जय श्री कृष्णा. सबका भल...