Wednesday, 27 December 2017

आज का गीता पाठ-24


मन के हारे हार है ,

मन के जीते जीत,”(Taken from outside)
मन विचलित है उनका
जो विषयों में रखते प्रीत
I I2/190
अन्तःकरण भावना शून्य ,
शान्ति कभी ना मिलती ,
सदा लालसा रहती मन में
सुख की घड़ियां कभी ना चलती ,
I2/191
जल में चलती नाव ,
पतवारों को रोके वेग,
प्रभाव ऐसा इनिद्रयों का ,
हर लेती ही हैं बुद्धिवेग
I2/192
स्थिर बुद्धि उसी की है ,
काबिज कभी नहीं होती,
मन को केन्द्रित करें ,
प्रभु भक्ति में ले जाती ,
1 I2/193
सुख संसारिक पाने की होड़ ,
नाशवान समझते जन ,
दिन रात खुशी में बीते,
यही चाहते जन-मन
I2/194
योगी का ध्यान वहाँ ,
जो परम तत्व का साधन हो ,
सुख है रात्रि समान जिन्है ,
नहीं किसी का बन्धन हो,
I2/195
नदी का मिलन ,
जब सागर से हो जाता है ,
नदी विलीन होगी उसमें,
सागर ना विचलित होता है
I2/196
परमशान्ति आलिंगन करती,
योग करे ना कोई विकार ,
परमतत्व में विलीन हो तो,
करती बुद्धि इस को नकार
I2/197
त्याग -कामना ,तमन्ना -रहित ,
ममता ,,अहंकार रहित ,
परम शान्ति आलिंगन करती ,
रहे सर्वदा विकार रहित 
I2/198
ब्रह्म में स्थित पुरुष वही
योगी कभी ना मोहित होता ,
ब्रह्म स्थिति सदा सामने ,
ब्रह्मानन्द को प्राप्त होता ,
I2/199
ब्रह्मानन्द है परमानन्द ,
आनन्द की असीम सीमा 
जीते मरते जाना जिसने ,
मर्म जीवन का समझा उसने
I2/200
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना राज)

शेष कल


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