Saturday, 6 January 2018

26---आज का गीता पाठ


तृतीय अध्याय
 समर्पित है 
ऊन सभी मित्रों के लिए,
 जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं

हे माधव ! ज्ञान श्रेष्ठ पुरुष यहां,
कर्म से बढ़कर माना है ,
गंभीर कर्म में ना लगना ,
जब फल भयंकर जाना है
(3/1)
शब्दों का खेल मेल है, हे माधव!,
बुद्धि को मोह लेता है
सुस्पष्ट मार्ग दर्शाओ , हे भगवन!,
जो कल्याण प्राप्त कर देता है 
(3/2)
"सांख्य योग की निष्ठा,
ज्ञान योग में निहित है ,
योगी समझे कर्मयोग ,
निष्ठा इससे संचित है
(3/3)
ज्ञान योग वर्णित है पहले,
आसक्तिहीन है जो ,
फलेच्छा ना भ्रमित करती ,
लक्ष्य परम तत्व रखते है जो
(3/4)
आश्चर्य कर्म मौजूद यहां ,
मनुष्य को करने पड़ते हैं ,
अकर्म बने निष्कर्मता ,
फल दूर sada ही रहते हैं 
(3/5)
कभी समय ना ऐसा आया ,
मानव रहा कर्म से दूर ,
स्वभाव जनित है कर्म में लीन,
करता कोई ना इनसे दूर 
,(3/6)
दम्भी मिथ्याचारी है वे ,
ऊपर से रहते हैं दूर ,
मन में बसी वासना अनगिनत,
जाते कभी ना इनसे दूर
(3/7) 

मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(
अर्चना राज)

शेष कल

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