Tuesday, 9 January 2018

27---आज का गीता पाठ


तृतीय अध्याय
समर्पित है 
ऊन सभी मित्रों के लिए,
जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं

समय,स्थान ,लोक़  व्यवहार
इनकी अपनी अलग पहचान 
धरा पे जीना जीवन जरूरी 
कर्म से मिलती है पहचान 
(3/227)
रमण करें  जीवन में आत्मा 
जीता इसमें रहता 
संतुष्ट  रहे, तृप्त रहे 
कर्तव्यपरायण वह रहता 
(3/228)
अर्जुन  समझो इस रहस्य को
 नहीं बधा मैं कर्मों से 
अप्राप्य नहीं तीनों लोकों में 
बरतता ,पाता मै कर्मों से
(3/229)
सावधान रहता हूं , अर्जुन ,
कर्म बरतता, हानि बचाता ,
जानू जन की कमजोरी : ,
पीछे आता; आगे बढ़ता
(3/230)
कर्म करूं ,ना बंधन तोड़ू,
मनुष्य कल्याण सामने
जनहित परम धर्म सबका ,
रहता अहित सदा थामने
(3/231)
जनता डूबी कर्म-कार्य में
जीवन को गति मिलती ,
कर्म जरूरी आवश्यक ,
सद्गति इससे उसको मिलती 
(3/232) 
नासमझ दुनिया में जो ,
कर्म करते जीवन यापन,
भ्रम की स्थिति दूर रहे ,
कर्म से होता जीवन पालन
(3/233)
परम तत्व में लीन पुरुष ,
कर्म करे जैसे अज्ञानी ,
कर्म चक्र बढता, जाए ,
मूल भाव समझे ज्ञानी
(3/234)
 मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना राज)


शेष कल

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