तृतीय अध्याय
समर्पित है
ऊन सभी मित्रों के लिए,
जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं
समर्पित है
ऊन सभी मित्रों के लिए,
जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं
महापुरुष इस विश्व में ,
जनता से रहता दूर ,
फर्क नहीं सोच में ,
कर्म करे या रहे वो दूर
(3/235)
समझो
इस
रहस्य
को,
अर्जुन !,,
नहीं
बना
मैं
कर्मकार्य से ,
जो
चाहूं
मिल
जाएगा,
पर मै भी जीता.कर्मकार्य से
(3/236)
स्वार्थ
भाव से काफी
ऊपर,
कर्मकरें या रहे दूर ,
लेना-देना नहीं बास्ता
महापुरुष रहता है दूर
(3/237)
आसक्ति पाल ना ,अर्जुन तू ,
कर्म का संपादन कर ,
परम तत्व से होता मिलन,
सदा मोह से रहता दूर ,
(3/238)
ज्ञानी जानी , जनकादि
कर्म दिलाया परम सिद्धि ,
जनहित में तू कर्म कर
तुझे संवा रे तेरी बुद्धि
(3/238)
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

No comments:
Post a Comment