Wednesday, 17 January 2018

आज का गीता पाठ-30



तृतीय अध्याय
समर्पित है
ऊन सभी मित्रों के लिए,
जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं
लोभ लालच के वश में आकर,
आगे कुछ पल का मिलता भरोसा है,
भय पैदा कर् धर्म दूसरे ,
जीवन में फिर धोखा ही धोखा है,
(3/258)
हे पार्थ ! धर्म को समझो,
उत्तम सर्वोत्तम घर अपना ,
मिलकर कल्याण करें सब,
दूर करो तुम भ्रम अपना
(3/259)
Greed and Help when one is poor is the fraudulent approach from others in faith,they win t
he pleasure of the people for the time being and then they create situations like this that each and every one faces only frauds.O Arjun! Understand Dharma first ,it emphasis on what is best to be adopted and what is worst is to be rejected.Our own home is the best one.Even if there is problem,only we have to solve it ,it does not give the permission for others to come to us and spread their welfare and scheme thereof.
दुखी अर्जुन असफल सोच
नहीं, चाहता ऐसा हो,
मनुष्य बलात किसके करता ,
अधर्म पाप निन्दा हो ,
(
3/260)
बदलाब देखते लोगों में ,
हरदम पाला वे बदलते ,
ऐसा किस कारण होता,
दुनिया में वे क्यों भटकते
(3/261)
रजोगुण युक्त समझो, पार्थ !,
यह काम ही क्रोध है ,
इससे बड़ा ना पापी कोई ,
पल -2लेता प्रतिशोध है
(3/262)
नहीं कभी अघाता,
विषयों का तू वैरी जान ,
सबसे बड़ा यें पापी है ,
मनुष्य की तू कमजोरी मान
(3/263)
अग्नि जले, आँखे ना देखे ,
धुएं से सब ओझल हो जाता,
ओझल ;जेर से गर्भ, मैल से दर्पन ,
ज्ञान काम से ढक़ जाता
(3/264)
अग्नि धधकती बढ़ती हर पल,
स्वभाव से दूर तृप्ति,
काम क्रोध के वश में मानव,
कभी ना मिलती संतुष्टि
(3/265)
पर्दे दर परतें देखें ,
मिलता अल्प ज्ञान यहाँ ,
विचार ही बैरी बनाते जहाँ में ,
यही बड़ा अज्ञान यहां
(3/266)

मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(
अर्चना राज)
शेष कल

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