चतुर्थ अध्याय
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
धर्म
की रक्षा ,
दुष्ट
का अन्त ,
भय
मुक्त रहे ,
धरा
पे सन्त(good people)”
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प्रभु
स्वभाव रहता है सम,
तत्व
ज्ञान को समझा जो ,
प्रभु
से जान विलीन उन्हीं में
जीवन
मुक्तिपाया है वो
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राग
द्वेष भय क्रोधको त्याग ,
स्थित
हुए जो मुझमें जन,
ज्ञानमार्ग
से सिद्धि मिली
विलीन हुए वो मुझ में जन
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मार्ग
अनुकरण करते मेरा ,
मालूम
होता जुदा-2,
जो जेसा करता ,पाता है ,
दिलसे
भजता मुझको सदा
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Note--(They
also serve the God ,
who
stand and wait,even John Milton
stresses
the same thing)
भीख
मांगते पूजन करते,
धरा पे होता ये हर दिन हर पल ,
सिद्धि
मिले कर्मों से उनको,
भरें देव कर्मों के फल
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Note--(Basically
we all are beggars in
one or the other way)
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
शेष कल
(अर्चना व राज)

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