Sunday, 28 January 2018

35---आज का गीता पाठ


चतुर्थ अध्याय 
जय श्री कृष्णा
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)


कर्म-विभाजन फल की इच्छा,
 सेवा करनी सबको मेरी
 कर्म का कर्ता मैं हूं जानो
कर्म में भला कौन सी देरी
4/491
जगत की रचना मेरी
 लहू का रंग ए्क समान
कर्म में कैसा भेदभाव?
जो बाटें समझो मूर्ख समान
4/492
Note----Some people are confused here ,
even Shakespeare has written ,
some people are born great,
some achieve greatness and
upon some greatness is entrusted
 upon. Work is pious ,
it is not ours ,but already exist here.
कर्म का कारक मैं हूं
 सृष्टि रचना कर्ता मैं
 रहस्य व्याप्त है जग में
 अकर्ता रहता फिर भी मैं
4/493
Note-----Many poets and writers
have talked of Secrets/mysteries
prevailing here. Einstein
 also claims that the Nature
shows its tail only and we
claim to study scientifically,
major portion is beyond our reach

कर्म से फल ,कर्म का फल  ,
लगाब रहे मुझसे दूर ,
तत्व ज्ञान से मुझकों जाने,
 वह प्रिय ना रहता मुझसे दूर”
4/494
असमंजमस में अर्जुन है,
 प्रभु की   बातें रहस्य भरी,
 जगत का कर्ता ,हे भगवन !
ज्ञान राह है प्यास भरी
4/495
अकर्ता से पैदा भ्रम,
शान्त रहे सृजन के बाद ,
कर्म से, कर्म में मानव स्वतन्त्र ,
पर अंशात चित्त कर् ते फरियाद
4/496
माया मोह के ज़ाल को तोड़,
वीर महान सपूत आगे आते ,
राजधर्म निभा सच्चे मन से ,
देश समाज की रक्षा करते
1/496
जब सब सोते रहेगें ,
देश धर्म सब खोते रहेंगे,
धर्म की हानि होगी तब
फिर क्या बैठे रोते रहेंगे
4/497
शान्त प्रेम की बातों को ,
अधर्म नहीं मानता है,
इसको इसकी हद में रखना ,
अधर्म यही जानता है
4/498
छूट इसे(अधर्म)  मिल जायेगी, अर्जुन,
 होगी मार काट ,लूटपाट, हाहाकार
 विनाश करेगा आलिंगन ,
बोलो किसकी होगी जय जयकार
4@499
ज्ञानवान थे पूर्वज अपने
जो हमको दिये है सब
कर्म महान उनका था
राह निकाली उननें तब
4@500
मिला है हमको उनसे
पावन पवित्र उपवन अपना
कर्म महान धरा की जान
कहते करते पूरा सपना
4@501
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II

(अर्चना राज)


शेष कल

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