Wednesday, 31 January 2018

37---आज का गीता पाठ


चतुर्थ अध्याय 
जय श्री कृष्णा
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)


सिद्धि असिद्धि का फर्क नहीं
फल के पीछे दौड़ नहीं,
 बन्धन बांध सके न उसको ,
कभी करेगा होड़ नहीं,
4/511
धर्म वही जो दिल को जीते ,
द्वेष भाव की बात चले ना,
 विश्व हमारा उपवन है ,
अधर्म ना समझे इसको हाँ
4/512
पशु पक्षी या इंशा हों ,
प्रेम से दिल है सबका धड़कता,
 अधर्म भला क्या समझेगा ?
काटो, पीटो,मारो कहता फिरता
4/513
अधर्म ढ़ोग रचाता ,पार्थ ,
सत्य की बालि का देता उदाहरण ,
पलभर में भ्रमित करता
 देता उदाहरण साधारण
4/514
जीव जन्तु परम तत्व की देन
 समय ने सबको बन्धन में डाला
सारा जीवन एक समान
भेद  भाव मूर्खों     ने  डाला
4/515

यज्ञ में अर्पण करना,
यज्ञ में बृह्मतुल्य है माना ,
हवन द्वव्य बृह्म रूप है,
कर्ता बृह्मस्वरूप है माना,
4/516
 बृह्मस्वरूप है आहुति देना ,
यज्ञ करा ना कर्म पुन्य है,
 फल की  प्राप्ति बृह्मस्वरूप ,
आगे इसके सिर्फ शून्य है,
4/517
देवपूजन भी होता है ,
यज्ञ सरीखे अनुष्ठान,
दर्शन अभेद यज्ञ के द्वारा
करते है योगी  महान,
4/518
यज्ञ की माया अपरम्पार ,
जानी स्वाह करे वासना ,
विषय विषयान्तर की लत ,
तर्पण पाती सभी कामना
4/519
यज्ञ का मार्ग सरल है,
दर्शाता त्याग तपस्या ,
बृह्म हवाले करो स्वयं,
 हटती है सभी समस्या
4/520
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II

(अर्चना राज)


शेष कल

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