चतुर्थ अध्याय
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
देवतुल्य यज्ञ को करते ,
योगी करते अनुष्ठान
ज्ञान चक्षु से जाने बृहम
,
तनिक न करते वे अभिमान
4/521
स्वयं को समझें पार्थ ,(आत्मस्वरूप)
यज्ञ से परमबृह्म को जानें
एकात्म स्थापित करते हैं
वे
ज्ञान में छिपे विज्ञान
को मानें
4/522
योगी ,त्याग ,तपस्या की
प्रतिमूर्ति
इंद्रियों पे वे रखते सयंम
स्वाह करें वे विषयों को
संकल्प करें वे रहते कायम
4/523
मन से, दिल से, चित्त स्वरूप
परमबृहम का करते चिन्तन
हवन में करें स्वाह वासना
निर्मल होता उनका तन मन
4/524
ज्ञान प्रकाश देता है सबको
मार्ग प्रशस्त कर देता है
जीवन रहस्य को समझे वे
ज्ञान प्रकाशित कर देता
है
4/525
यज्ञ के मौजूद रूप अनेक
संकल्प करें ,पाते मुकाम
ज्ञान यज्ञ, द्रव्य यज्ञ
,योग तपस्या
फल देते हैं निष्काम
4/526
संकल्प सत्य अंहिंसा का
लेते,
स्वाध्याय से करते ज्ञान यज्ञ,
मार्ग अनेक हैं बृहम तत्व,
मुकाम दिलाते यही यज्ञ,
4/527
अपान वायु में प्राण वायु
,
प्राण बायु में अपान वायु
,
प्राण वायु रोक करते हवन,
जीते बनके दीघार्यु
4/528
नियमित संयंमित खानपान,
शरीर पे देते पूर्ण ध्यान ,
हवन की महिमा वे समझे
रहस्य भरा है ये विज्ञान ,
4/529
पापनाश करते वे साधक,
मानवता को जीवन समरपित
जनवादी वे दिल से होते,
जीवन करते अपना अरपित
4/530
पार्थ !सुनो तुम इनका अनुभव
,
अमृत देता इन्है हवन,
रसपान करें ये योगीजन ,
निर्मल होता इनका तनमन
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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