पंचम अध्याय
जय श्री कृष्णा.
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(समर्पित है देश के वैज्ञानिकों के नाम जो असमय मौत का शिकार
बने)
हे ! माधव भ्रमित हूं इतना मैं,
समझ सोच से बाहर है
कर्मयोग और कर्म सन्यास,
कर्म कौन सा बेहतर है ?
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साथ -2 दोनों चलते ,
सम्भव कैसे हो सकता ?,
विपरीत दिशा मैं चलके ,
मुकाम कैसे मिल सकता?,
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पार्थ !भ्रम का प्रश्न नहीं उठता ,
कल्याण के साधन दोनों ,
कर्म योग है सुगम जहां ,
कर्म को समझो,कर्म को मानो
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राग द्वेष से मुक्त रहे
कामना , जिनसे दूर
हर्ष-विषाद में फर्क नहीं
अभिलाषा रहती जिनसे दूर
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साधु ,सन्त ,फकीर, महात्मा,
बन सन्यासी सेवा करते
ज्ञान मिले प्रकाश फैलता
दिल से जन की सेवा करते
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दोनों ही इस जहां में .
सम्यक विचार रखें
(दिल से )अपनाओ किसी एक को
सबका ये उद्धार करें
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ज्ञान योग भी राह दिखाता ,
कर्मयोग भी न रहता पीछे ,
परम धाम को प्राप्त करें
छोड़ मूर्खता ,पार्थ! तू पीछे
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यथार्थ को समझो,पार्थ!,
दोनों हैं रूप समान
इक दूजे के पूरक हैं
छिपा रहस्य यही तू मान
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कर्मयोग का रहे अभाव ,
कर्तापन का त्याग कठिन
परम तत्व को प्राप्त करें
दिल से योगी करे मनन
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राह आसां बनाते दोनों
,
जीवन के तार समझने को ,
परम तत्व से होगा मिलन,
राह अलग है जाने को
5/568 शेष कल
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
यही प्रार्थना कृष्ना तुमसे
,
दुख दर्द कभी ना पास आये
,
दुनिया में शान्ति हो,
प्रेम से जीवन कटता जाये
देश हमारा सोने की चिडिया,
साकार रूप फिर से पाये,
हर आफत विपदा दूर रहे
शक्ति इतनी फिर से आये
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े
I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(अर्चना व राज)

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