Sunday, 11 February 2018

41---आज का गीता जीवन पथ


पंचम अध्याय 
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(समर्पित है देश के वैज्ञानिकों के नाम जो असमय मौत का शिकार बने)

जितेन्द्रय इस जहां में ,
मन भी वश में रहता है
सम्पूर्ण जगत प्रतिबिम्ब है उसका
विशुद्ध अन्तःकरण रखता है
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सोते ,जगते, खाते ,पीते ,
सूघें ,सुनते ,चलते - चलते ,
आंख मूदते ,आंख खोलते,
देखे; त्यागें भोजन करते करते
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ग्रहण करें ,त्याग करें
श्वास चले,बोलें कहते
अपना कर्म करें इंद्रियां
देखें ;जीवन में जीते जीते
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सांख्ययोगी (ज्ञानधारा में विश्वास) समझते इसको,
तत्व के मर्म की समझ रखते
स्वयं कर्म में लीन इन्द्रियां
कर्म करें वे जीते जीते
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स्वतन्त्र स्वभाव है इनका,
लीन कर्म में रहती है ,
नहीं हस्तक्षेप मेरा भी
अविरल चलती रहती है (इन्द्रियां)
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कर्म करें सारे मानव,
कर्म अर्पन भी करते हैं,
आसक्ति से रहे युक्त
कमल की भांति खिलते हैं,
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जैसे जल में कमलपांति,
जल में रहते ,रहें विलग ,
असर प्रभाव न होता उनपे ,
रहते प्रायः अलग अलग(इन्द्रियां कर्म )
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मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना राज)
शेष कल
यही प्रार्थना कृष्ना तुमसे ,
दुख दर्द कभी ना पास आये ,
दुनिया में शान्ति हो,
 प्रेम से जीवन कटता जाये
देश हमारा सोने की चिडिया,
साकार रूप फिर से पाये,
हर आफत विपदा दूर रहे
शक्ति इतनी फिर से आये

 (अर्चना राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद खुद समाप्त हो जायेगा

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