आज का गीता जीवन पथ
अष्ठम अध्याय
जय श्री कृष्णा.
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो
!
(समर्पित है देश के किसानों के नाम ;गर्मी, सर्दी या बरसात ;उनकी महनत व परिश्रम के प्रतिफल जीवन चलता है हम,जिनकी सेवाओ से
प्रेरित व सुरक्षित हैं)
धर्म क्या ?,अध्यात्म क्या ?,
कौन बृहम
? कर्म क्या ?
अधिभूत ,अधिदेव, कौन?
शीघ्र करो ,प्रभु तुम बंया
8/757
जीवन का मर्म !,अधियज्ञ कौन?
शरीर से कैसा नाता ?
मुक्त चि त्त
वाले ज्ञानी
कैसे तुमसे
जोड़ते नाता ?
8/758
माधव से पृच्छा की अर्जुन ने,
प्रश्न बड़े
विचलित करते
जीवन का मर्म
समझ पाना!
मुश्किल में
हम सब पड़ते
8/759
अन्त समय जब आता है
जग भी लेता मुंह को मोड़
तेरी शरण में सभी पुकारें
(कैसे) तुमसे
लेता nata जोड़ ?
8/760
मुस्कान बिखेरे मधुसूदन बोले ,
बृहम बृहमा न्ड
का परम अक्षर
जीवात्मा मतलब अपना रूप
सरल रूप में समझे ज्ञानी नर
8/761
भूतों का भाव उत्पन्न करें ,
वही त्याग
का नाम कर्म ,
अधिभूत कहे जाते तत्व पदार्थ ,
जन्म मरण हैं जिनका धर्म
8/762
अधिदेव के चलो नाम गिनते ,
प्रजापति,बृहम,सूत्रात्मा नाम अनेक
हे !अर्जुन देह रूप में देखो जिनकों
अधियज्ञ ,अर्न्तयामी उनमें से एक
8/763
जो ना दिखता है ,?
कहां वो छिपता है ,?
नजरों से दूर, दिल
केपास
संशय जिसका
रहता है
8/764
कभी सामने ,नजरों से ओझल,
कभी न आता ,रूप ना दिखता
कभी प्रकट, कभी हैं धूमिल,
अशरीरी ताकत; अता,पता ना चलता
8/765
रूप ना जिसको बांध
सका,
इंशा ने भी
उसको साधा,
दाता सबका एक है हे ! पार्थ
कभी ना बन्धन उसको बाधा
8/766
परमपिता परमेश्वर ,
परम बृहम वही है एक,
ईशा क्या
समझेगा ?,
अनेकों में वही है एक
8/767
अन्तिम क्षण जब आता है,
जीव भजे उसका
नाम ,
शरीर को त्यागते जब हम
दर्शन अपना देते (हैं) घनश्याम
8/768
संशय की गुंजाईश ना,
समझ बोध में दूरी !,
मन में भाव
हैं जिसके जैसे ,
इच्छा अपनी करता पूरी,
8/769
भक्तिभाव से भरा हुआ,
मन से करे
विचार,
पूर्ण होती
हैं मन की चाहत ,
जन्म मिले इच्छानुसार,
8/770
जीवात्मा जो चाहे,
अक्सर मिलता
है, अर्जुन,
भक्तिभाव में लीन जो रहता,
इच्छा पूरी होती अर्जुन!
8/771
(Note---It is said, even after the theory of
Karma on the Earth, at the time of leaving the world, whatever image ,the dying
man sees, normally he gets the birth: We proved the rebirth theory and luckily
modern world confirms time and again)
स्मरण कर ,हर पल तू
आगे बढकर युद्ध कर
लीन रहोगे मन बुद्धि से ,
मुझे मिलोगे तुम मरकर
8/772
पार्थ! नियम हैं शाश्वत
ध्यान योग में ज्ञानी लीन
(कुछ )अज्ञानी भी तो देखें हैं ,
शान्त भाव से होते लीन,
8/773
परम प्रकाश है जिससे कायम,
चिंतन हमको जो देता
अन्तिम सत्य वही है ईश्वर
प्राप्त अन्त में उनको होता
8/774
रूप है अर्न्तयामी उसका,
उससे संचालित
यहां कर्म
सर्वज्ञ नियन्ता सबका है
रूप यही है उसका धर्म
8/775
अति सूक्ष्म में भी सूक्ष्म हैं ,
धारण पोषण उसका रूप ,
सदर्श सूर्य प्रकाश पुन्ज,
वही सच्चिदानन्द स्वरूप
8/776
(Note---Even Writers like Remond Moody talks of
Prakash Punj (Constantly burning flame)in his book Life after Death; based on
the experience of the people declared dead ,but suddenly alive. This shows that
5000 years ago, the things narrated are found truly confirmed)
हर विद्या से है परे,
सम्पूर्ण
ज्ञान का वह भण्डार ,
शुद्ध स्वरूप रूप सर्वोत्तम ,
जग में छाती उससे बहार
8/777
पूर्ण है पूर्णता उससे,
ज्ञान विज्ञान
रहस्य ध्यान ,
अपूर्ण हम हर दृष्टिकोण
प्रयास करें हम उसको जान
8/778
जिज्ञासु समय बिताते ;जाने,
रहस्य से पर्दा ,चाहे हटाना
झलक मिल जाये
,आशा कायम
पागल होता सारा
जमाना
8/779
ज्ञान है उससे ,ध्यान है उससे ,
उससे जीवन सारा जहान,
वो सच्चिदानन्द स्वरूप
उससे बड़ा न कोई महान
8/780
शातिर चलते अपनी चाल,
ना उसने बांटा है संसार ,
वो तो सबका पालन हार
वो तो प्रेम से करता (है) उद्धार
8/781
प्रिय हैं सब उसको,
जीव जन्तु क्या चर -अचर ?,
उसकी रचना बृह्माण्ड हमारा
समझ ना पाते हम मगर
8/782
जो भजता है उसको ,
जीवन में श्रृद्धा जो रखता ,
योग है अभ्यास जिसका ,
बस उसमें ही रमता है
8/783
अभ्यास करें बार -2 ,
प्राण स्थापित भृकुटी मध्य,
योग बल से जाने रहस्य,
प्रयत्न करे जो सदा नित्य,
8/784
निश्चल भाव मन में जिसके,
श्रृद्धा से भजता रहता ,
ना काहू से दुश्मनी ,
प्रेम भाव सबसे रखता,
8/785
वही तो जाना है उसको ,
दिल में बसाये रहता है
अन्त में प्राप्त करे उसको ,
सत्य यही वह रखता है
8/786
कुछ अज्ञानी
भी हैं, अर्जुन,
न समझें कहते, उसको,जानते
उधार का ज्ञान जेब में रखते ,
मूर्ख बनाते बांटते जाते
8/787
झूठ का सहारा वो लेते ,
लोगो को मूर्ख बनाते ,
राजनीति की रोटी सेकें,
नाम बांटते उसका फिरते,
8/788
वेदों के विद्वत जन,
रहस्य से पर्दा उठाते ,
अविनाशी के रूप !
बताते, घूमते फिरते
8/789
सच्चिदानन्द स्वरूप परमपिता ,
परमपद केवल उसका
आसक्ति रहित ,यत्नशील सन्यासी
मार्ग तलाशे उसका
8/790
बृहमचारी का व्रत बृहमचर्य
आचरण भी उसका वैसा
चाहत मन में तिष्ठित
( करते) सोच -रूप भी वैसा
8/791
सरल अल्फाजों में ,अर्जुन!
तू केवल इतना जानना,
सरल मार्ग को चुनना
या कठोर मार्ग ही अपनाना
8/792
राह सभी चुनते हैं मेरा
किसी के दिल में श्रृद्धा होती
मुकाम मिले मन के जैसा
कोशिश हर स्तर पर होती
8/793
कोई रखता बदन को साफ ,
नियम कठोर कोई बनाता
कोई लीन तपस्या कठोर
श्रृद्धा मन में कोई लाता
8/794
मन को जीतें कैसे ?
प्रयास करें रोकें श्वास
मन को स्थिर रखता कोई
यहीं बांधता उसकी आस,
8/795
मस्तक मध्य केन्द्रित करता
योग धारणा में लीन
ऊँ बृहम अक्षर रट्ता कोई
निर्गुण बृहम में रहते लीन
8/796
रूप अनेकों में भी एक
परमबृहम परमेश्वर है
अन्त उसी में छिप जाता है
केवल वही एक एकेश्वर है
8/797
मन में श्रृद्धा ,मन से पावन
परम बृहम को पहचानें
उधार का झंझट क्यों लेना ?
दिल से हम उसको जानें
8/798
पार्थ !सुनो अब तुम ,
जिसके अनन्य चित्त में मैं,
तन मन दिल से भजता है,
सुलभ सदा योगी को मैं
8/799
श्रृद्धा भाव को मिले तवज्जो ,
मार्ग भटकता है इंशान
श्रृद्धाभाव से ईश्वर मिलता
सर्वसुलभ है इसी जहान
8/800
परमसिद्धि जिसको मिलती
आने जाने का फेर नहीं
क्षणभंगुर दुख का जीवन ; फिर
मिलता बार - बार नहीं
8/801
अर्जुन ! समझो इसको तुम,
आने जाने का है क्रम
नहीं अछूती दुनिया है ,
दूर करो ,तुम अपना भ्रम
8/802
जिसने मुझको प्राप्त किया ,
इस बन्धन से मुक्ति पाता
सुख दुख के जंजालों से
दूर स्वयं को वो पाता
8/803
बृह्रमा का एक दिन ,अर्जुन
एक हजार चर्तुयुगीत अवधि बाला
,
रात भी इतनी लम्वी होती है
कथन बड़ा है ;भ्रम में डाला
8/804
जागृत बृह्रमा के दिन से
सृजन ? रूप को पाता है
रहस्य भरा इस दुनिया में
यही कहानी कहता है
8/805
युग-2 की वही कहानी है
अव्यक्त व्यक्त होते है
जीवन पाते ,विचरण करते
प्रगट व्यक्त वे होते हैं
8/806
रात्रि अंधेरी लम्बी है
अव्यक्त व्यक्त हो जाते है
जिसको जीवन मिलता है
विलीन वे इसमें हो जाते हैं
8/807
भूतादि का दिन भी ,
शुरू रात्रि से होता है
विचरण करते प्रकृति के वश
यहीं अचम्भा होता है
8/808
अव्यक्त वह परम तत्व,
विलक्षण उसकी लीला सारी ,
नष्ट जगत में सब होता,
यही अनोखी नीति है. न्यारी,
8/809
अव्यक्त नष्ट (कभी )ना होता है
परे समझ से होता है
ये रहस्य भरा है! जग सारा
जीवन अपना भी होता है
8/810
क्यों अाना ,क्यों जाना ?
माया मोह में क्यों हम डूबे ?
पूर्ण उस की रचना है !
जान सके ना ,क्या हम बूझे ?
8/811
वही पूर्ण ,सम्पूर्ण है
पूर्णता भी उसमें निहित
मिले ना उस की थाह कोई
अपूर्ण है हम;दुनिया में चिह्ित
8/812
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
अध्याय समाप्त
(अर्चना व राज)

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