Monday, 2 April 2018

55--- आज का गीता जीवन पथ


आज का गीता जीवन पथ

नवम अध्याय 
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(समर्पित है देश  के मजदूर के नाम ;गर्मी, सर्दी या बरसात ;उनकी महनत व परिश्रम के प्रतिफल जीवन चलता है हम,जिनकी सेवाओ से  प्रेरित व सुरक्षित हैं, हर काम समय पर होता हैं)

दुखिया सब संसार है,
मुक्ति का जन ढूंढ़े उपाय ,
जीवन भर भटकता प्राणी,
उपाय समझ ना आय
9/813
मुक्ति का माध्यम ज्ञान ,
पार्थ!तुझे जानना बहुत जरूरी,
मुक्ति पाना सबका मन ;
यही है बनती मेरी मजबूरी
9/814
 ज्ञान विज्ञान की परत को खोलो,
 रहस्य पास में आता है ,
उत्तम सर्वोत्तम ज्ञान है , पार्थ
दिल से सबको भाता है
9/815
यही दिलाता फल हमको,
 सहज रूप से कुछ न मिलता ,
धर्मयुक्त साधन से ही ;
पुष्प जैसा है जीवन खिलता
9/816
भ्रम में रहता ,कभी ना रूकता,
शृद्धा-विहीन पुरूष का भाग्य,
 कभी प्राप्त न होता मुझको ,
यही बड़ा उसका दुर्भाग्य
9/817

सुगम बनाता जीवन अपना
उत्तम सर्वोत्तम मेरा साधन!
धर्मयुक्त साधन अपनाना ;
परम तत्व से होता मिलन
9/818
जमता जल है ,अर्जुन
यह बर्फ समान है सदृश
मुझे ढूंढ़ता जग सारा ?
सदा मैं रहता अदृश
9/819
भूतकाल में जो भी स्थित
 संकल्प मेरा है ,अर्जुन
 मुंझे ढूढ़ना सबकी कोशिश
अस्त व्यस्त सब करते जीवन
9/820
ताज्जुव होता है ,पार्थ !,
भूत का पोषण,भूत का धारण ,
नहीं आत्मा मेरी स्थित, (भ्रमित सभी)
जान सके ना इसका कारण ?
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ब्यार चले अाकाश में,
 रहती व्याप्त सारे जहां,
 वही हाल मेरा है ! पार्थ !,
भूत व्याप्त हैं सारे जहां
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संकल्प मेरा काफी है ,
स्थिति परिस्थिति भी बदले,
 व्याप्त भूत, भविष्य भी है
जीवन को भी गति मिले
9/823
समय बीतता ;पीछे जाता
प्रकृति में लीन होता है सब
 रचना करनी होती मुझको
 लीला है यही गजब
9/824




कर्म प्रधान है जग सारा
सबको उनके कर्मों के फल
 ब्रार -2 जग को रचना
यही सूझता मुझको हल
9/825
कर्मों का ताना-बाना
कर्मों का है यहां खेल
 चक्र जीवन का चलता है
जीवन का है इनसे मेल
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प्रकाश पुन्ज है मुझसे,
प्रकति को मिलता है निर्देशन
 समय चक्र है चलता रहता,
 होते नित नये प्रर्दशन
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मूर्ख सदा बनते है, मानव
 सदा सत्य से दूर वे रहते
अपनी बात सिर माथे ,
लाख उदाहरण वे देते
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आलस उन पर हावी होता
समझें न वे योग -माया
रहस्य भरा ये जीवन है,
कहीं घूप ,कहीं छाया
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उद्धार जगत का करने को
“मानव ”मात्र समझते जन
उस गहराई तक कभी न पहुंचे
खोये रहते अपने तन मन,
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आशा व्यर्थ ,निराशा व्यर्थ ,
व्यर्थ जीवन का है निचोड़ ,
विक्षिप्त-चित्त ,अज्ञानी मन ,
नहीं समझते इसका तोड़
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खोये इनमें रहते है, अर्जुन
यही विड़म्वना है भारी
 नहीं समझते असली मकसद
नहीं पता ! ये क्या लाचारी ?
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जो जीवन का मोल समझता ,
खोया मुझमें चिन्तन करता
वही परम तत्व को जाना है
बन के (मेरा) प्रिय ;जीवन जीता
9/833
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(
अर्चना राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद खुद समाप्त हो जायेगा

(अर्चना राज)

शेष कल

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