नवम अध्याय
जय श्री कृष्णा.
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो
!
(समर्पित है देश के मजदूर के नाम ;गर्मी, सर्दी या बरसात ;उनकी महनत व परिश्रम के प्रतिफल जीवन चलता है हम,जिनकी सेवाओ से
प्रेरित व सुरक्षित हैं, हर काम समय पर
होता हैं)
सनातन सत्य स्वरूपा
, अर्जुन
परम सत्ता निहित
है मुझमें,
ज्ञानी समझे ;तत्व रहस्य का
रहता सब कुछ
निहित है मुझमें
9/834
निशदिन करें
मेरी प्रार्थना
दिल से मुझे
करें प्रणाम
यत्न करें वे
तरह-2 से
हर पल भजते मेरा
नाम
9/835
कीर्तन करते,
पूजन करते
त्याग भावना,
व्रत भी रखते
मेरी प्राप्ति
ध्येय है उनका
प्रयत्न सदा वे दिल से करते
9/836
ज्ञानी इस जगत
में ,अर्जुन
ज्ञान से मेरी
करें उपासना ,
दिल में भाव ; सम्मान झलकता
यही है उनकी पुनीत भावना
9/837
रूप विराट देखो
मेरा ,अर्जुन
कुछ पूजन योग्य
समझते
पूजा पद्वति
अलग-2 है ,
दिल में भाव
यही रखते
9/838
रूप मेरे हैं
अनेकानेक ,
व्रत मैं ,यज्ञ
में मैं,
स्वधा,सुधा में
मैं हू
औषधि यन्न्त्र
मंत्र में मैं
9/839
हवन करते जन,
अर्जुन
अग्नि प्रकट
होती उससे
मैं ही अग्नि,पार्थ
अग्नि प्रज्वलित
होती है मुझसे
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रिग ,साम, अथर्व ,यर्जुवेद
मुझसे आता ज्ञान अथाह
मुझसे माता भ्राता
पिता
कोई जान सका
न मेरी थाह
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मैं ही ओंकार
हूँ
कर्मो का फल
है मुझसे
जगत का धारण
कर्ता
स्रोत संसार
है
मुझसे 9/842
Note-Meaning
thereby I am also the manifestation of Param Tatva
वास स्थान जगत
में अंतिम
शरणागत होते
हैं जन
हित अनहित जुड़ा
है ,पृभो
नादान, अव्यवस्थित
सबका मन
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हे जगत के स्वामी
अर्न्तयामी !
कर्मों का फल
,मुझको भी देना
जब ऑऊं द्वारे
तेरे मैं
शरण में अपनी
ले लेना
9/844
सृजन होता है
मुझसे ,पार्थ
कारण विनाश का
बनता
कारण अविनाशी भी है
रूप धरा का मुझसे
सजता
9/845
सत असत मुझमें
निहित
अमृत/ मृत्यु
का स्रोत है मुझसे
तपता सूर्य से
प्रतिदिन हूं
बर्षां भी आ्कर्षित होती मुझसे
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संतुलन है जगत
में मुझसे
नियम निश्चित
होते संचालित
असंतुलन न टिक
पाता है
होता मुझसे ये
पृभावित
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ज्ञानी जन समझें
इस को ,
मूल भाव में
क्या सत्यता
यज्ञ बनाते माध्यम
अपना
रहस्य छिपा है
वही समझता
9/848
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(अर्चना व राज)
शेष कल

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