दश
म अध्याय
जय श्री कृष्णा.
जय श्री कृष्णा.
सबका
भला
हो
!
(समर्पित है देश के सब
खिलाड़ियों के नाम ;गर्मी, सर्दी
या बरसात ;उनकी महनत
व परिश्रम के प्रतिफल हमें
सम्मान मिलता है
हम,जिनकी सेवाओ से
प्रेरित व गौरवान्वित होते हैं)
“अन्त विस्तार का न होगा,
ये दिव्य विभूति मेरी है
अर्जुन! तुमको अब बतलाना है
जव ये इच्छा तेरी है”
10/890
सब भूतों के ह्दय में स्थित
आदि ,मध्य और हूं अन्त
आत्मा रूपी रूप है मेरा
रूप यही है मेरा अनन्त
10/891
विष्णु का अवतार हूं मैं ,
तेज देव का मुझसे है,
चमक सूर्य
चन्दा जैसी
आलोकित ये मुझसे है
10/892
मैं ही जीवन शक्ति ,हूं,
वेदों में हूं सामवेद
मन हूं इंन्द्रियों में मैं
और देवों में हूं इन्द्रदेव
10/893
एकादश रूद्रों में शंकर,
धनका स्वामी मैं कुबेर
आठ वसुओं में अग्निहंू
पर्वतों में मैं हूं सुमेर
10/894
सागर जैसा रूप मेरा ,
जलाशय मिलते मुझमें
सब गुरुओं का गुरू बृहस्पति,
हर ज्ञान समाया है मुझमे
10/895
सेनापति में स्कन्द
शब्दों का अक्षर औंकार
ऋषिओं में मैं भृगु,
रूप मेरा ये साकार
10/896
यज्ञों में जप यज्ञ ,
पहाड़ में मैं खड़ा हिमालय ,
वृक्षों में तू पीपल जान
लोग पूजते देवालय
10/897
देवऋषि नारद मैं,
गन्धर्वों में चित्र रथ ,
सिहों में कपिल मुनि
हासिल मुझको महारत
10/898
अश्वमें उच्चैशृवा ,
श्रेष्ठ हाथी में ऐरावत,
राजा मानें जग सारा ,
यही मेरी हकीकत
10/899
गायों में गाय कामधेनु ,
शास्त्रों में वज्र रूप,
कामदेव मैं उत्पत्ति का
वसुकि सर्पो का स्वरूप
10/900
नागों में मैं शेषनाग ,
जल चर अधिपति वरूण देव
पितरों में मैं अर्यमा पितर
जहां में हूं यमदेव
10/901
दैत्यों में पहलाद हूं मैं
गणना करते समय जान
पशुओं में मृगराज
पक्षियों में तू गरूड़ मान
10/902
पवित्र मैं करता वायु रूप
शस्त्रधारी मैं श्रीराम अगर
नदियों मैं गंगाजी हूं मैं
जल में रूप मेरा मगर
10/903
आदि अन्त और मध्य रूप (सृष्टिका )
ज्ञान में बृह्म विद्या
वाद भी जो आपस में होते
तत्व निर्णय मैं सविद्या
10/904
अकार समाया मुझमें
मैं हूं द्वन्द समास
काल का भी महाकाल
बंधती मुझसे सबकी आस
10/905
विराट स्वरूप है मेरा
पालन पोषण सब का करता
मुझे समझने की कोशिश
हर कोई मन से करता
10/906
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
शेष कल

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