बारहवां अध्याय
जय श्री कृष्णा.
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो
!
(समर्पित है देश की
प्रैस के नाम ;IV PILLAR; इतनी असुरक्षा और PRESSING SITUATIONS के मध्य उनकी महनत व परिश्रम के प्रतिफल न केवल हम जागररू्क और अप- टू-डेट रहते है ,हम उनकी सेवाओ से
प्रेरित व गौरवान्वित
भी होते हैं)
त्याग श्रेष्ठ
हैं सर्वोत्तम,
फलेच्छा को त्यागो
नहीं फर्क ; जहां ना जाने
कर्म कभी ना
; अपने त्यागो
12/1046
जैसा कर्म जहां
में होगा,
वैसा तेरा फल होगा
जीव जगत है कर्म
बन्धन में
फल मुझको ही
देना होगा
12/1047
त्याग से मिलती
संतुष्टती ,
मन को शांति
मिलती है ,
अौरों को भी
बने प्रेरणा ,
अनुभूति अलग
ये देती है
12/1048
(जो) पुरुष इसी जहां में, राग द्वेष
किंचित स्वार्थ नहीं रखता है
मानवता उसमें जीवित है
दिल से प्रेम सभी करता है
12/1049
ममता गरूर ना
डर हो ,दिल में
सुख दुख में भी सम रहता,
इन्द्रीय जिस
के वश में हैं
योगी है ;सन्तुष्ट
रहता
12/1050
अर्पित तन मन मुझको करता,
भ क़्ति भा्व में डूबा रहता,
मुझको मेरा भक्त प्रिय है
जग सारा खुल के कहता
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उद्वेग प्राप्त ना होता है ,
ना जीव को देता है उद्वेग,
हर्ष-अमर्ष में सम है
गति न मोड़े
उसका वेग
12/1052
मन में इच्छा आकांक्षा ,
भीतर बाहर से है शुद्ध,
पक्षपा्त से दूर वह रहता,
दुख ना करता मन को अशुद्ध
12/1053
आरम्भ का भी त्याग,
मन से कोमल चंचल,
प्रिय जहां में मुझको है ,
नहीं चलता हैं बातें बदल
12/1054
कभी ना हर्षित वो होता ,
खुशी चाहे माहौल बनाये ,
दुखड़े पग-2 उसके हो ,
जग चाहे माखौल उड़ाये
12/1055
शोक कामना से अतिदूर ,
शुभ अशुभ का फर्क नहीं,
भक्ति तनमन पे छाये ,
आगे इसके तर्क नहीं
12/1056
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
शेष कल
(God
is omnipotent, omniscient and omnipresent)

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