Saturday, 26 May 2018

86---आज का गीता जीवन पथ


चौदहवां अध्याय 

*Chapter 14*

_Live a lifestyle that matches your vision_

जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(
समर्पित है देश के विद्यार्थियों के नाम ; इत नी महनत और परेशानी के मध्य केवल अप ने लक्ष्य को प्राप्त करते  है, बल्कि अपने सपनों को साकार रूप देते हुये देश की तरक्की में अटूट योगदान देते हैं)




सुख (सच्चा ) लाता है सतगुण 

 रजगुण कर्म को सिंचित करता है

व्यर्थ चेष्टायें मन की !

तम गुण भरता रहता है

14/1192




रज गुण ,तम,गुण,छिपता है,

 सतगुण अपना काम करे

 तम गुण,सत गुण छिपता है

रज गुण अपना सवाल करे

14/1193

जब रज गुण सत गुण दूर रहें,

 तम गुण का है बोलबाला

कितना भी समझाओ ,बताओ

तम गुण उसका रखवाला

14/1194

चेतनता आती देह हमारी,

 मिले विवेक मन को

अन्तकरण जब साफ शुद्ध ,

सतगुण मिलता तन मन को

14/1195

रज गुण बढ़ता, स्वार्थ बढ़ाता

लालच की ना सीमा होती

 तृष्णा प्यासी रहती है

अनन्त कामना पैदा होती

14/1196

सकाम भा्व कर्म में होता

 फल की इच्छा सा्थ में चलती

चाहत पहले ;फल मिल जाये

 अल्पकाल की शान्ति मिलती

14/1197

आरम्भ काम का जब होता

मन में अशन्ति होती है

फल ना फिस ले हाथों से

 हलचल दिल में होती है

14/1198

बढ़े लालसा विषय भोग की

 तृप्ति कभी मिलती है

शांति मन में न रह ती

चाहत की सीमा ना होती है

14/1199

बढ़ता है जब तम गुण

अंधकार छा जाता है

विषाद प्रिय होता है मानव

माया में खो जाता है

14/11200

कर्तव्य विमुख हो जाता है

तृष्णा बढ़ती जाती है

मन मोहित हो जाता है

जब सत्य से दूरी बढ़ती है

14/1201

सतगुड़ी पुरुष जब मरता है

मिलता सम्मान उसे

 दरवाजे स्वर्ग के खुले हुए हैं

कही मिलता अपमान उसे

14/1202

मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(
अर्चना राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद खुद समाप्त हो जायेगा

 (God is omnipotent, omniscient and omnipresent)

शेष कल

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