17वां अध्याय
Chapter 17*
__Choosing the right over the
pleasant is a sign of power_
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(1 7वां अध्याय समर्पित है सभी वन
रक्षक व वन अधिकारियों के नाम; जिनकी मेहनत से देश -विदेश हरा -भरा रहता है ,और हम सभी को प्रेरित करते हैं)
वाणी उनकी मधुर है
प्रेम बढ़ाते इसी जहां
आयु ,बुद्धि ,बल व सुख
देता उनको यही जहां
17/1354
जैसा खाए अन्न
वैसा होए मन
सदिया कहती आई
भोजन से बनता तन-मन
17/1355
प्रिय है व्यक्ति जहां में सबके
प्रेम प्यार की बातें करते
मुझको भी देते हैं खुशी
कभी न जीवन में डरते
17/1356
खान पान भी राजसी होता
कड़वा ,खट्टा, तीखा ,गरम
दुख, चिंता ,रोग बढ़ाता
ना होती उन को कोई शर्म
17/1357
भोजन बासी ,अधिपका, कच्चा
अपवित्र उच्छित होता है
तामस व्यक्ति की है पसंद
खाते ;उनको प्रिय लगता है
17/1358
यज्ञ करते हैं शास्त्र विहित
कर्तव्य अपना समझते हैं
मन की इच्छा मांगे फल ना
राह सात्विक वे पकड़ते हैं
17/1359
अर्जुन दंभ -आचारी समझ
फल की इच्छा मन में जिनकी
यज्ञ आदि करते हैं वे
राजस सोच है उनकी
17/1360
शास्त्रों को नकारते कुछ
अन्न दान से रहित वे करते
श्रद्धा दिल में ना बसती
मंत्र रहित यज्ञ वे करते
17/1361
दान-दक्षिणा से रहते दूर
ज्ञान ना उनके बस
तामस यज्ञ है उनका
मन करता उनका बरवस
17/1362
ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जाने
गुरु ज्ञान बांटता चलता
देव प्रसन्न रहते हैं उनसे
सच्चा कर्म यह चलता रहता
17/1363
शरीर संबंधी तप ये करते
ज्ञानी ध्यानी पूजन पवित्र
सरल ब्रम्हचर्य और अहिंसा
भाव ना होते उनके अपवित्र
17/1364
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(God is omnipotent, omniscient and
omnipresent)
शेष कल

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