17वां अध्याय
Chapter 17*
__Choosing the right over the
pleasant is a sign of power_
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(1 7वां अध्याय समर्पित है सभी वन
रक्षक व वन अधिकारियों के नाम; जिनकी मेहनत से देश -विदेश हरा -भरा रहता है ,और हम सभी को प्रेरित करते हैं)
राजस भी हमें समझना है
फल की इच्छा होती प्रबल
कार्य विशेष को करता बाध्य
निबल बांटे ,चाहे सबल
17/1386
कार्य विशेष जब पूरा करना
सहयोग सभी का आवश्यक
मिलजुल के हाथ बढ़ाते हैं
समय विशेष ;पर फलदायक
17/1387
जो पात्र नहीं दान-दक्षिणा
कुपात्र पर करते हैं कल्याण
तामस उनकी प्रवृत्ति है
दान का होता है अपमान
17/1388
देश काल व परिस्थिति
समझे बिना न करना दान
नुकसान तुम्हारा ही होगा
अपमान रहेगा तेरा मान
17/1389
दभ भरते हैं जो
पूजा-पाठ भी करते
राजस लगता जैसे
सब कुछ वही हैं करते
17/1390
यज्ञ मिटाता है अज्ञान
वातावरण भी साफ शुद्ध
रोगाणु विषाणु मरते हैं
वहां न रहता कोई अशुद्ध
17/1391
जहां ना शास्त्र विहित है यज्ञ
अन्नदान ना होता है
मंत्रों का होना महज छलावा
बिन श्रद्धा ;जो होता है
17/1392
ना दान दक्षिणा का हो अभाव
अमीर गरीब का ना हो भेद
प्रेम से सभी कार्य संपन्न
न मन में रहता कोई मतभेद
17/1393
ओम तत् सत शब्द है तीन
याद सदा तुम रखना
वेद ,ब्राह्मण, ज्ञान यज्ञ आदि
आधार बने इनकी रचना
17/1394
ओम बना है पहला अक्षर
ईश्वर को संबोधित करता
शास्त्र विहित सब कार्यों में
काम शुरू इनसे होता
17/1395
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(God is omnipotent, omniscient and
omnipresent)
शेष कल

No comments:
Post a Comment