15वां अध्याय
*Chapter 15*
Give priority to Divinity_
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(समर्पित है देश के बच्चों के नाम ,जिनका मुस्कुराहट से भरा हुआ चेहरा हमारी न केवल
थकान को मिटा देता है , बल्कि कल के भविष्य के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित करता है)
संसार है अपना वृक्ष समान,
पाती वेदमंत्र माने
जो समझे मूल तत्व को
वही वेद की महिमा जाने
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आदि पुरुष परमेश्वर है
इसका पालनहार है जाना
वासुदेव भगवान वही है
संसार प्रेम से जिसने जाना
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अविनाशी यह वृक्ष मान
इन से बहती ज्ञान की महिमा
लोग समझते
इसका मतलब
बढ़ती इनसे सबकी गरिमा
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शब्द स्पर्श रूप रस गंध
नवीन को पलें आती हैं
त्रिगुण सीचते जल इनको
शाखा बढ़ती जाती है
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शाखा का मतलब है ;
त्रियक ,देव और मानव
होता इनसे विस्तार जगत में
पैदा जीव, जंतु और दानव
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अंधकार ,ममता ,मोह
माया पैदा करे कामना
कर्मों में ब न्ध
जाता इंसा
घर करती है बुरी भावना
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नव कर्मों से ही अपना
भाग्य बनाता है मानव
फल भोगे पिछले कर्मों का
सुख भी भोगे मानव और दानव
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ममता अहं वासना
ज ड़ इन की बढ़ती
है
बांधे दुनिया को सारी
ऊपर नीचे चढ़ती है
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विषय भोग हैं पुरुष यहां ,
माया मोह के जाल फसा
मेरा अपना है बस !
लगता ;मिलता यही दगा
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मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(God is omnipotent, omniscient and
omnipresent)
शेष कल

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