17वां अध्याय
Chapter 17*
__Choosing the right over the
pleasant is a sign of power_
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(1 7वां अध्याय समर्पित है सभी वन
रक्षक व वन अधिकारियों के नाम; जिनकी मेहनत से देश -विदेश हरा -भरा रहता है ,और हम सभी को प्रेरित करते हैं)
अर्जुन भ्रमित हुए थोड़ा सा ,
हाथ जोड़कर बोले ,माधव
जिसने शास्त्र पढ़ा
ना जीवन में
कैसे होते प्रसन्न रब
?
17/1343
तामस ,सात्विक, राजस
मुझे बताओ ,भगवन, इनको
उद्धार करें जीवन में
अपना
अपनाएं ,पाएं हम भी
इनको
17/1344
“स्वभाव जनित है श्रद्धा
सात्विक जो जीवन अपनाता
आगे इनका वर्णन ,सुनो
,पार्थ
क्या खोता ,क्या पाता
?
17/1345
श्रद्धा जन्म लेती है
साफ शुद्ध है मन जिसका
अंतकरण में जगह बनाती
श्रद्धा मय मन है जिसका
17/1346
सात्विक पूजन करते देवों का
यक्ष राक्षस भजते राजस
भूत प्रेम का भजन है भजते
चरित्र है उनका तामस
17/1347
कपोल कल्पित बातें हैं
कुछ की
तन को खूब सताते हैं
उनकी सोच; उनकी प्रेरणा
बात यही बताते हैं
17/1348
कुछ ने कष्ट सहा है
खूब
शास्त्रों का करते तिरस्कार
असुर स्वभाव है उनका
भला न करते उनके उपकार
17/1349
सुख ना पाता जीवात्मा
घोर अत्याचारी हैं वे
सालों तक भूखे रहते
हैं
कैसे कह दें व्यवहारी
हैं वे
17/1350
“दंभ भरते ,योग्य स्वयं को जाने
जो कहते सच ,उसको माने
अनंत कामना दिल में रखते
देवों से ना कम माने
17/1351
भोजन भाता उनकी इच्छा
तीन प्रकार का होता है, सुन ”
“यज्ञ तप और दान भी तीन
विस्तृत वर्णन, पार्थ अब तू मुझसे सुन
17/1352
प्रिय सात्विक व्यक्ति जहां में
साफ शुद्ध है दिल उसका
उनका स्थिर रहता खानपान
खाते ;दिल भी जीते सबका
17/1353
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(God is omnipotent, omniscient and
omnipresent)
शेष कल

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