18वां अध्याय
*Chapter 18*
_Let Go, Lets move to union with
God_
जय श्री कृष्णा.
सबका भला हो !
(1 8 वां अध्याय समर्पित है सभी शिक्षकों
के नाम; जिनकी मेहनत से देश-विदेश में बच्चों का जीवन न केवल
ज्ञानवान व समृद्धशाली बनता है बल्कि स्वयं को मोमबत्ती की तरह जला कर देश- विदेश में
उजाला करते हैं , जिनके लिए समाज कृतज्ञ रहता है अतः हम सबको और भी परिश्रम कर देश का नाम रोशन करना चाहिए. गीता पाठ से स्पष्ट है
कि जीवन में ;अंत में कुछ भी नहीं)
जिसकी बुद्धि तीव्र जगत में
ब्राह्मण वही कहलाने लायक
देश सुरक्षा में ज़ो आगे
छत्रिय वही समझने लायक
18/1471
व्यापार जगत में जिनका चलता
अर्थ बनाता दुनिया का आधार
सेवा भाव मन में जो होता
लुप्त होता जग से अंधकार
18/1472
(ब्राह्मण)
“कर्म विभाजन आवश्यक
सहज संचालन होता जरूरी
कर्म बदलते राह बदलती
बने न जन की ये मजबूरी
18/1473
इंद्रिय दमन अंतःकरण निग्रह
धर्म पालन और कष्ट सहे
बाहर भीतर रहे सदा शुद्धता
क्षमा वान व सरल रहे
18/1474
अपराध क्षमा वह करता है
वेद शास्त्र का उसको ज्ञान
श्रद्धा ईश्वर लोक परलोक
अध्ययन-अध्यापन बढ़ाता मान
18/1475
अच्छा अनुभव जब साथ में रहता
सदा सत्य कर्म है होते
वही ब्राह्मण होता है
कर्म शास्त्र सात्विक जिसके होते”
18/1476
तेज झलकता शूरवीर है वह
धैर्य भी उसके साथ चले
योद्धा चतुर वो होता है
ख्याति जग में उसको मिले
18/1477
दान भी देना कर्म स्वभाविक
क्षत्रिय जग में कहते सभी
रक्षा का दायित्व है उनका
मान भी मिलता उन्हें तभी
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खेती ,गोपालन, क्रय, विक्रय
व्यापार वो सच्चा करता है
वैश्य कहे ;दुनिया जाने
मान सभी का रखता है
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सेवा भाव है दिल में जिसके
सेवा समाज की करता है
अनुकूल वो अपने कर लेता
भाव वो दिल में रखता है
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भगवत प्राप्त हेतु शरणागत
प्रयास उसी का सच होता
कर्म मार्ग है उत्तम
कभी किसी को ना अचरज होता
18/1481
कर्म की राह आसां बनाता
परमतत्व से मिलना संभव
आगे का वर्णन मुझसे सुन
कोई काम जहां में नहीं असंभव
18/1482
जगत की रचना जिसने की है
संसार रचा है जिसने
वह परम तत्व जग में है व्याप्त
कर्म भी रचा है उसने
18/1483
जल में वर्फ व्याप्त है जैसे
कण-कण में है वही समाया
है स्वभाव जनित पालन वह करता
दिल से उसने इन्हें बसाया
18/1484
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से जुड़े I
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा
(God is omnipotent, omniscient and
omnipresent)

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