आज का गीता पाठ
तृतीय अध्याय
समर्पित है
ऊन सभी मित्रों के लिए,
जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं
तृतीय अध्याय
समर्पित है
ऊन सभी मित्रों के लिए,
जो अपनी मीठी यादें छोड़ कर इस जहां से अपने अनजान शहर को जा चुके हैं
मोहित होता जीवात्मा ,
इन्द्रीय मन बुद्धि स्थान ,
आच्छादित होता ग्यान यहां
काम ही ढ़कता सारा जहान ,
(3/267)
इन्द्रीय वश में रखना ,पार्थ !,
विनाश का कारण बनता यहां ,
ग्यान विग्यान सब खो जाते,
काम ही
करता नाश यहां
(3/268)
सबसे बड़ा पापी ये ,
धीमे-2 चंगुल में लेता ,
पश्चाताप भी करते लोग ,
चंगुल से जब बाहर होता ,
(3/269)
स्थूल शरीर में निवास ,
इन्द्रीय श्रेष्ठ सूक्ष्म बलवान ,
इनसे मन; मन से बुद्धि ,
बुद्धि से ऊपर आत्मा महान,
(3/270)
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
शेष कल

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