Sunday, 21 January 2018

32-आज का गीता पाठ



चतुर्थ अध्याय
जय श्री कृष्णा.
(समर्पित है देश के वीर जवानों के नाम)
कहा कृष्ण ने अर्जुन से;
देव सुने अबिनाशी-योग,
अपने पुत्र को बाचा उसने ,
इक्षवाकु बने ;वाहक- योग ,
4/275
चली परम्परा.पीढ़ी-दर ,
राज रिषि हुए लाभान्वित,
योग रहा लुप्त प्रायः कभी,
अब धरा है इस से गौरवान्वित ,
4/276
उत्तम सर्वोत्तम योग यहाँ ,
मित्र सुना तुमने मुझसे ,
जानो समझो इसी योग को ,
रहस्य छिपा है अब भी इसमें,
4/277
समझ मेरे आता ,हे !भगवन ,
आज देखता तुम को मैं ,
सूर्य जन्म है युग बीते ,
कहा आपने; समझू कैसे मैं ,
4/278
जीवन है जन्मों की कहानी ,
कल बीता है आज सामने ,
जानूं सबका हिसाब किताब ,
समझो इसका तुम मायने
4/279
माया मोह का है संसार,
 सुना यहाँ ;कहते है सभी
योग माया आधीन है मेरे
चलती रूकती नहीं कभी
4/280
मेरी विनती
कृपा तेरी काफी है ,प्रत्यक्ष प्रमाण मैं देता
जब-2 विपदा ने घेरा ,गिर ने कभी ना तू देता
साथ मेरे जो पाठ है करते ,कृपा बरसते रखना तू
हर विपदा से उन्है बचाना ,बस ध्यान में रखना कृष्ना तू
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
शेष कल

(अर्चना राज)

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